गुरुवार, 19 मई 2011

पहेली - 4 (परिणाम) (आगरा का किला, आगरा, उत्तर प्रदेश)

तकनीकी कारणो से परिणाम समय से नहीं दिया जा सका , उसके लिए खेद है

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पहेली का सही उत्तर है

आगरा का किला, आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत
मुख्य द्वार
जहांगीर महलदीवाने - ए - आमशीश महलदीवाने - ए - खास
मुसम्मन बुर्ज

आगरा का किला एक यूनेस्को घोषित विश्व धरोहर स्थल है, जो कि भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित है। इसे लाल किला भी कहा जाता है। इसके लगभग 2.5 कि.मी. उत्तर-पश्चिम में ही, विश्व प्रसिद्ध स्मारक ताज महल स्थित है। इस किले को चहारदीवारी से घिरी प्रासाद (महल) नगरी कहना बेहतर होगा।

यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण किला है। भारत के मुगल सम्राट बाबर, हुमायुं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां व औरंगज़ेब यहां रहा करते थे, व यहीं से पूरे भारत पर शासन किया करते थे। यहां राज्य का सर्वाधिक खजाना, सम्पत्ति व टकसाल थी। यहां विदेशी राजदूत, यात्री व उच्च पदस्थ लोगों का आना जाना लगा रहता था, जिन्होंने भारत के इतिहास को रचा।

इतिहास

यह मूलतः एक ईंटों का किला था, जो चौहान वंश के राजपूतों के पास था। इसका प्रथम विवरण 1080 ई. में आता है, जब महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा किया था। सिकंदर लोधी (1487-1517), दिल्ली सल्तनत का प्

रथम सुल्तान था, जिसने आगरा की यात्रा की, व इस किले में रहा था। उसने देश पर यहां से शासन किया, व आगरा को देश की द्वितीय राजधानी बनाया। उसकी मृत्यु भी, इसी किले में [1517]] में हुई थी, जिसके बाद, उसके

पुत्र इब्राहिम लोधी ने गद्दी नौ वर्षों तक संभाली, तब तक, जब वो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में काम नहीं आ गया। उसने अपने काल में, यहां कई स्थान, मस्जिदें व कुएं बनवाये।

पानीपत के बाद, मुगलों ने इस किले पर भी कब्ज़ा कर लिया, साथ ही इसकी अगाध सम्पत्ति पर भी। इस सम्पत्ति में ही एक हीरा भी था, जो कि बाद में कोहिनूर हीरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इस किले में इब्राहिम के स्थान पर बाबर आया। उसने यहां एक बावली बनवायी। सन 1530 में, यहीं हुमायुं का राजतिलक भी हुआ। हुमायुं इसी वर्ष बिलग्राम में शेरशाह सूरी से हार गया, व किले पर उसका कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा

पांच वर्षों तक रहा, जिन्हें अन्ततः मुगलों ने 1556 में पानीपत का द्वितीय युद्ध में हरा दिया।

इस की केन्द्रीय स्थिति को देखते हुए, अकबर ने इसे अपनी राजधानी बनाना निश्चित किया, व सन 1558 में यहां आया। उसके इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा है, कि यह किला एक ईंटों का किला था, जिसका नाम बादलगढ़ था। यह तब खस्ता हालत में था, व अकबर को इसि दोबारा बनवाना पड़ा, जो कि उसने लाल बलुआ पत्थर से निर्मण करवाया। इसकी नींव बड़े वास्तुकारों ने रखी। इसे अंदर से ईंटों से बनवाया गया, व बाहरी आवरण हेतु लाल ब

लुआ पत्तह्र लगवाया गया। इसके निर्माण में चौदह लाख चवालीस हजार कारीगर व मजदूरों ने आठ वर्षों तक मेहनत की, तब सन 1573 में यह बन कर तैयार हुआ।

अकबर के पौत्र शाहजहां ने इस स्थल को वर्तमान रूप में पहुंचाया। यह भी मिथक हैं, कि शाहजहां ने जब अपनी प्रिय पत्नी के लिये ताजमहल बनवाया, वह प्रयासरत था, कि इमारतें श्वेत संगमर्मर की बनें, जिनमें सोने व कीमती रत्न जड़े हुए हों। उसने किले के निर्माण के समय, कई पुरानी इमारतों व भवनों को तुड़वा भी दिया, जि

ससे कि किले में उसकी बनवायी इमारतें हों।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में , शाहजहां को उसके पुत्र औरंगज़ेब ने इस ही किले में बंदी बना दिया था, एक ऐसी सजा, जो कि किले के महलों की विलासिता को देखते हुए, उतनी कड़ी नहीं थी। यह भी कहा जाता है, कि शाहजहां की मृत्यु किले के मुसम्मन बुर्ज में, ताजमहल को देखेते हुए हुई थी। इस बुर्ज के संगमर्मर के झरोखों से ताजमहल का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखता है।

यह किला १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय युद्ध स्थली भि बना। जिसके बाद भारत से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य समाप्त हुआ, व एक लगभग शताब्दी तक ब्रिटेन का सीधे शासन चला। जिसके बाद सीधे स्वतंत्रता ही मिली

खाका

आगरा के किले को वर्ष 2004 के लिये आग़ाखां वास्तु पुरस्कार दिया गया था, व भारतीय डाक विभाग ने 28 नवंबर,2004 को इस महान क्षण की स्मृति में, एक डाकटिकट भी निकाला था।

इस किले का एक अर्ध-वृत्ताकार नक्शा है, जिसकी सीधी ओर यमुना नदी के समानांतर है। इसकी चहारदीवारी सत्तर फीट ऊंची हैं। इसमें दोहरे परकोटे हैं, जिनके बीछ बीच में भारी बुर्ज बराबर अंतराल पर हैं, जिनके साथ साथ ही तोपों के झरोखे, व रक्षा चौकियां भी बनी हैं। इसके चार कोनों पर चार द्वार हैं, जिनमें से एक खिजड़ी द्वार, नदी की ओर खुलता है।

इसके दो द्वारों को दिल्ली गेट एवं लाहौर गेट कहते हैं (लाहौर गेट को अमरसिंह द्वार भी कहा जाता है)।

शहर की ओर का दिल्ली द्वार,, चारों में से भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है, जिसे हाथी पोल कहते हैं, जिसके दोनों ओर, दो वास्तवाकार पाषाण हाथी की मूर्तियां हैं, जिनके स्वार रक्षक भी खड़े हैं। एक द्वार से खुलने वाला पुर, जो खाई पर बना है, व एक चोर दरवाजा, इसे अजेय बनाते हैं।

स्मारक स्वरूप दिल्ली गेट, सम्राट का औपचारिक द्वार था, जिसे भारतीय सेना द्वारा (पैराशूट ब्रिगेड) हेतु

किले के उत्तरी भाग के लिये छावनी रूप में प्रयोग किया जा रहा है। अतः दिल्ली द्वार जन साधारण हेतु खुला नहीं है। पर्यटक लाहौर द्वार से प्रवेश ले सकते हैं, जिसे कि लाहौर की ओर (अब पाकिस्तान में) मुख होने के कारण ऐसा नाम दिया गया है।

स्थापत्य इतिहास की दृष्टि से, यह स्थल अति महत्वपूर्ण है। अबुल फज़ल लिखता है, कि यहां लगभग पाँच सौ सुंदर इमारतें, बंगाली व गुजराती शैली में बनी थीं। कइयों को श्वेत संगमर्मर प्रासाद बनवाने हेतु ध्वस्त

किया गया। अधिकांश को ब्रिटिश ने 1803 से 1862 के बीच, बैरेक बनवाने हेतु तुड़वा दिया। वर्तमान में दक्षिण-पूर्वी ओर, मुश्किल से तीस इमारतें शेष हैं। इनमें से दिल्ली गेट, अकबर गेट व एक महल-बंगाली महल – अकबर की प्रतिनिधि इमारतें हैं।

अकबर गेट अकबर दरवाज़ा को जहांगीर ने नाम बदल कर अमर सिंह द्वार कर दिया था। यह द्वार, दिल्ली-द्वार से मेल खाता हुआ है। दोनों ही लाल बलुआ पत्थर के बने हैं।

बंगाली कहल भी लाल बलुआ पत्थर का बना है, व अब दो भागों -- अकबरी महल व जहांगीरी महल में बंटा हुआ है।

यहां कई हिन्दू व [[इस्लामी स्थापत्यकला] के मिश्रण देखने को मिलते हैं। बल्कि कई इस्लामी अलंकरणों में तो इस्लाम में हराम (वर्जित) नमूने भी मिलते हैं, जैसे—अजदहे, हाथी व पक्षी, जहां आमतौर पर इस्लामी अलंकरणों में ज्यामितीय नमूने, लिखाइयां, आयतें आदि ही फलकों की सजावट में दिखाई देतीं हैं।


आगरा किले का भीतरी विन्यास और स्थल




  • अंगूरी बाग - ८५ वर्ग मीटर, ज्यामितिय प्रबंधित उद्यान

  • दीवान-ए-आम - में मयूर सिंहासन या तख्ते ताउस स्थापित था इसका प्रयोग आम जनता से बात करने और उनकी फरयाद सुनने के लिये होता था।

  • दीवान-ए-ख़ास - का प्रयोग और उसके उच्च पदाधिकारियों की गोष्ठी और मंत्रणा के लिये किया जाता था,जहाँगीर का काला सिंहासन इसकी विशेषता थी

  • स्वर्ण मंडप - बंगाली झोंपड़ी के आकार की छतों वाले सुंदर मंडप

  • जहाँगीरी महल - अकबर द्वारा अपने पुत्र जहाँगीर के लिये निर्मित

  • खास महल - श्वेत संगमरमर निर्मित यह महल, संगमरमर रंगसाजी का उत्कृष्ट उदाहरण है

  • मछली भवन - तालाबों और फव्वारों से सुसज्जित, अन्त:पुर (जनानखाने) के उत्सवों के लिये बड़ा घेरा

  • मीना मस्जिद- एक छोटी मस्जिद
  • मोती मस्जिद - शाहजहाँ की निजी मस्जिद

  • मुसम्मन बुर्ज़ - ताजमहल की तरफ उन्मुख आलिन्द (छज्जे) वाला एक बड़ा अष्टभुजाकार बुर्ज़

  • नगीना मस्जिद - आलिन्द बराबर मे ही दरबार की महिलाओं के लिये निर्मित मस्जिद, जिसके भीतर ज़नाना मीना बाज़ार था जिसमें केवल महिलायें ही सामान बेचा करती थी।

  • नौबत खाना - जहाँ राजा के संगीतज्ञ वाद्ययंत्र बजाते थे।

  • रंग महल - जहाँ राजा की पत्नी और उपपत्नी रहती थी।

  • शाही बुर्ज़ - शाहजहाँ का निजी कार्य क्षेत्र

  • शाहजहाँ महल - शाहजहाँ द्वारा लाल बलुआ पत्थर के महल के रूपान्तरण का प्रथम प्रयास

  • शीश महल - royal छोटे जड़ाऊ दर्पणों से सुसज्जित राजसी वस्त्र बदलने का कमरा

अन्य उल्लेखनीय तथ्य

  • आगरा के किले को, इससे अपेक्षाकृत बहुत छोटे दिल्ली के लाल किले से नहीं भ्रमित किया जाना चाहिये।

    मुगलों ने दिल्ली के लाल किले को कभी किला नहीं कहा, बल्कि लाल हवेली कहा है। भारत के प्रधान मंत्री यहां की प्राचीर से 15 अगस्त को, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, प्रति वर्ष, देश की जनता को सम्बोधित करते हैं।
  • सर अर्थर कॉनन डायल, प्रसिद्ध अंग्रेज़ी उपन्यास लेखक के शेर्लॉक होम्स रहस्य उपन्यास द साइन ऑफ फोर में, आगरा के किले का मुख्य दृश्य है।

प्रसिद्ध मिस्री पॉप गायक हीशम अब्बास के अलबम हबीबी द में आगरा का किला दिखाया गया है।

मिर्ज़ा राजे जय सिंह के संग “पुरंदर संधि” के अनुसार, शिवाजी आगरा 1666 में आये, व औरंगज़ेब से दीवान-ए-खास में मिले। उन्हें अपमान करने हेतु, उनके स्तर से कहीं नीचा आसन दिया गया। वे अपमानित होने से पूर्व ही, दरबार छोड़कर चले गये। बाद में उन्हें जयसिंह के भवन में ही 12 मई,1666 को नज़रबंद किया गया। उनकी एक ओजपूर्ण अशवारोही मूर्ति, किले के बाहर लगायी गयी है।


यह किला मुगल स्थापत्य कला का एक आदर्श उदाहरण है। यहां स्पष्ट है, कि कैसे उत्तर भारतीय दुर्ग निर्माण

, दक्षिण भारतीय दुर्ग निर्माण से भिन्न होता था। दक्षिण भारत के अधिकांश दुर्ग, सागर किनारे निर्मित हैं।

एज ऑफ ऐम्पायर – 3 के विस्तार पैक एशियन डाय्नैस्टीज़, में आगरा के किले को भारतीय सभ्यता के पांच अजूबों में से एक दिखाया गया है, जिसे जीतने के बाद ही, कोई अगले स्तर पर जा सकता है। एक बार बनने के बाद, यह खिलाड़ी को सिक्कों के जहाज भेजता रहता है। इस वर्ज़न में कई अन्य खूबियां भी हैं।

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आगरा का किला


आगरे के किला वास्तु का अनुपम उदाहरण पेश करता है। भारतीय वास्तु शैली के साथ ईरानी वास्तु शैली का अनोखा संगम इसे अद्भूत रूप प्रदान करता है। इस किला का मुगल काल में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से काफी महत्व था। यहां से प्रमुख मुगल शासकों ने देश में राज किया था। उस समय देश की राजधानी आगरा होने के

कारण यह किला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।


आगरा किले के निर्माण के पीछे उस समय की राजनीतिक कारक मुख्य भूमिका निभाया थी। अकबर मात्र 14 साल की उम्र में ही भारत की गद्दी पर बैठा। उस समय आगरा देश की राजधानी थी, इसलिये सुरक्षा के मद्देनज़र और साम्राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिये उन्होंने आगरा किले को एक नये सिरे से निर्माण करवाया।

इसे वर्ष 1565 से लेकर 1573 के मध्य बनाया गया। इस किले के समकक्ष ही दिल्ली में हुमायूं का मकबरा का निर्माण हुआ था। यह मूल रूप से ईंटों का किला था। इस किले पर प्रारंभ में सीकारवार राजपूतों का अधिकार था। इस बात का जिक्र 1080 ई. में इतिहासकारों ने किया है।

बाद में महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा कर लिया था। आगरा का किला लोधी वंश के शासन काल के समय ध्वसत मिट्टी के अनियमित स्वरूप में था, जो किले की दीवार को बरकरार रखा था। कालान्तर में यह किला सुरक्षा की लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा।

लोधी वंश का प्रथम शासक और दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान सिकंदर लोधी आगरा के किले में रहा करता था। इस स्थान से उसने देश पर शासन किया। सिकंदर लोधी ने आगरा को देश की राजधानी बनाया। उसकी मृत्यु इसी किले में 1517 ई. में हुई थी।

सिकंदर लोधी की मृत्यु के उपरान्त उसके पुत्र इब्राहिम लोधी ने नौ वर्षों तक राज किया। उसने अपने शासन काल में यहां कई स्थान पर मस्जिदें व कुएं बनवाये थे। इब्राहिम लोधी को प्रथम मुगल शासक और मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध 1526 ई. में जब हराया तो मुगलों ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया।

उस समय किले पर अधिकार के बाद मुगलों को खूब संपत्ति हाथ लगी थी। कहा जाता है कि उस संपत्ति में सबसे मूल्यवान कोहिनूर हीरा भी मुगलों को मिला था। यहां पर मुगल शासक अकबर, जहांगीर, शाहजहां के समय लाल पत्थर और उजले संगमरमर से कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य किये गये, जो किला को काफी आकर्षक और सुन्दर बना दिया।

इस किले का आकार मानव कान की संरचना से काफी मिलता-जुलता है। इसकी दीवार उसके परिधि से 20 मीटर ऊंचा और 2.5 मीटर चौड़ा है। किला खाई से घिरा हुआ है। अकबर के समय यह किला सेना के अंग का रणनीतिक हिस्सा होने के साथ-साथ राजशाही महल भी था। अकबर के बाद इस किले में जहांगीर और शाहजहां के समय कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य कराये गये।

यहां का ज्यादातर निर्माण कई वास्तु शैलियों का मिश्रण है। किले में कई वास्तुशिल्प को अपने अंदर समाहित करने के कारण, इसकी भव्यता और सुन्दरता दोनों बढ़ गयी है। उदाहरण के तौर पर जहांगीर महल जिसे अकबर ने बनबाया था। यह महल इस्लामिक और हिन्दू वास्तु शैलियों का अनोखा संगम है। यहां कई और निर्माण मिश्रित शैलियों के युग्म से बना है, जो इसे काफी आकर्षित बनाता है।

इस किले को भारतीय वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है, जो मुगल काल के स्थापत्य कला को यह एक नये कलेवर और फ्लेवर में प्रस्तुत करता है। यमुना के दांये किनारे पर बसी इस विश्व धरोहर इमारत को लोधी वंश के शासकों ने कई महत्वपूर्ण रूप दिये थे। इसे आगरे का लाल किला भी कहा जाता है। इस प्रसिद्ध स्मारक के लगभग 2.5 किमी. उत्तर-पश्चिम में विश्व प्रसिद्ध ताजमहल स्थित है।

इसे लोग प्राय: चहारदीवारी से घिरी नगरी कहते हैं। यहां प्रसिद्ध मुगल शासक पूरे भारत पर यहीं से शासन किया करते थे। शासन के केन्द्र में होने के कारण यहां राज्य का सर्वाधिक खज़ाना, सम्पत्ति व टकसाल थी। यहां विदेशी राजदूत, यात्री व उच्च पदस्थ लोगों का आना-जाना लगा रहता था। इस स्थान की गौरवपूर्ण सभ्यता और संस्कृति में यह किला चार चांद लगाता है।

मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने इस किले को अपने आधिपत्य में करने के बाद यहां एक बावली बनवायी। आगरे के इसी किले में 1530 ई. में मुगल सम्राट हुमायूं का राजतिलक भी हुआ। हुमायूं 1540 ई. में बिलग्राम के प्रसिद्ध युद्ध में शेरशाह सूरी से हार गया। इसके बाद सूर वंश का संस्थापक और शंहशाह शेरशाह का इस किले पर कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा।

पानीपत के द्वितीय युद्ध 1556 ई. में मुगल शासक बाबर ने दिल्ली के शासक हेमू को पराजित करने के बाद यह किला पुन: मुगलों के अधीन आ गया। इस स्थान की केन्द्रीय स्थिति को देखते हुये अकबर ने इसे अपनी राजधानी बनाना निश्चित किया। यहां वे 1558 ई. में आये। अकबर के समकालीन इतिहासकार अदुल फज़ल के शब्दों में ''यह किला वस्तुत: एक ईंटों का किला था, जिसका नाम बादलगढ़ था।

यह तब खस्ता हालत में था। इसी कारण अकबर को इसे दोबारा बनवाना पड़ा था। उन्होंने इसे लाल बलुआ पत्थर से बनवाया। इसकी नींव प्रसिद्ध वास्तुकारों ने रखी थी। इसे अंदर से ईंटों से बनवाया गया और बाहरी आवरण के लिये लाल बलुआ पत्थर लगवाया गया। इसके नये रूप को बनाने में चौदह लाख, चौवालीस हजार कारीगर व मज़दूरों ने आठ वर्षों तक मेहनत की।''

मुगल शासक शाहजहां ने इस स्थल को वर्तमान स्वरूप दिया। उसने किले के निर्माण के समय, कई पुरानी इमारतों व भवनों को तुड़वा भी दिया, जिससे कि किले में कई इमारतें भी हैं, जहां पर शाहजहां ने श्वेत संगमरमर और सोने व कीमती रत्न जड़वाए।
सोमगढ़ युद्ध जो 1658 ई. में हुआ था, उसके बाद औरंगजेब ने इस किले को अपने अधीन करके , वहां पानी सप्लाई को बंद करवा दिया था। चूंकि शाहजहां कुंए का पानी नहीं पीता था, इसलिये नदी के पानी को औंरगजेब ने जब बंद करवा दिया तो उसने औरंगजेब की अधीनता स्वीकार कर ली। जीवन के अंतिम दिनों में शाहजहां को उसके पुत्र औरंगजेब ने इसी किले में बंदी बनाकर रखा था।

एक ऐसी सजा, जो कि किले के महलों की विलासिता को देखते हुए उतनी कड़ी नहीं थी। यह भी कहा जाता है कि शाहजहां की मृत्यु किले के मुसम्मन बुर्ज में ताजमहल को देखेते हुए हुई थी। इस बुर्ज के संगमरमर के झरोखों से ताजमहल का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखता है। बंदी के रूप में शाहजहां यहां पर आठ साल तक रहा और 1666 ई. में उसका देहांत हो गया।

1638 ई. में शाहजहां ने औपचारिकता रूप से आगरा से देश की राजधानी दिल्ली बना दिया था। उसके बाद शाहजहां दिल्ली में ही रहने लगा। उसके निधन के बाद आगरा ने अपनी वैभवशाली चमक खो दी। औरंगजेब ज्यादातर समय दक्षिण के युद्ध में ही व्यस्त रहा। हालांकि कुछ समय के बाद यहां की रौनक फिर लौटने लगी। औरंगजेब यहां पर रहने लगा और राज कार्य भी यहीं से संचालित करने लगा।

यहां पर दरवार फिर से सजने लगा। यहां के दीवान-ए-खास में औरंगजेब शिवाजी से 1666 ई. में मिला था। इस मिलन के समय में ही औरंगजेब शिवाजी को गिरफ्तार करना चाहता था लेकिन शिवाजी चालाकी से यहां से भाग निकले। औरंगजेब के 1707 ई. में निधन हो जाने के बाद मुगलों का पराभव शुरू हो चुका था। उसके बाद उत्तरोतर मुगल शासकों के बीच इतनी शक्ति नहीं रह गयी थी कि इस किले की महानता और गौरव की रक्षा कर पाते।

मराठा और जाट के शासकों ने कुछ दिनों तक देश की इस शान की रक्षा की। लेकिन वे भी अंग्रेज़ों के चाल से निपट नहीं पाये और अंतत: 1803 ई. में मराठा से अंग्रेज़ों ने इसे छीन लिया। उसके बाद अंग्रेजों ने इस किले का उपयोग सैनिक छाबनी और अस्त्र-शस्त्र के रूप में किया। इस किले से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। प्रथम भारतीय स्वत्रंता संग्राम 1857 ई. के समय यह किला युद्ध स्थली भी बना।

इस प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के कारण ही भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य समाप्त हुआ। उसके बाद लगभग एक शताब्दी तक ब्रिटेन का भारत पर सीधे शासन चला और उसके बाद 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली।
जहांगीर महल

जहांगीर महल पहला उल्लेखनीय भवन है जो अमर सिंह प्रवेश द्वार से आने पर अतिथि सबसे पहले देखते हैं। यहां से आप जब दांयी ओर बढ़ते हैं, तो पवित्र दरगाह की ओर चले जाते हैं। महल के अहाते में हरित क्षेत्र से अच्छादित अच्छा खासा बड़ा लॉन है, जहां रहकर आप प्रकृति से अपने को करीब पाएंगे। अकबर ने इस महल का निर्माण राज घराने के औरतों के रहने के लिये करवाया था।

यह स्थान जनाना घर के नाम से भी जाना जाता है। यह महल अपने में सादगी को लपेटे हुये सुन्दरता की एक बेहतर मिसाल है। इसे बालू पत्थर के द्वारा बनबाया गया था। लेकिन यहां पर जो निर्माण वर्तमान में दिख रहा है, उस में से कुछ ही निर्माण ऐसे बचे हैं, जिसका अकबर के देखरेख में निर्माण हुआ था। इस महल के सिर्फ जनाना कक्ष women's quarters ही वर्तमान में अस्तित्व में है, जिसका निर्माण अकबर ने करबाया था।

इस महल की वास्तुशिल्प में सबसे सुन्दर भाग महल से लगे खम्भे को पत्थरों के द्वारा सहारा देकर अलंकृत किया जाना है। इमारत के सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी सजावटी पत्थर द्वारा महल के बीम (धरन)को मज़बूती प्रदान करना है। वास्तव में इस प्रकार के वास्तुशिल्प और तकनीकी का प्रयोग सर्वप्रथम इसी महल में हुआ है, बाद में देश के अन्य महत्वपूर्ण इमारत में इसकी नकल की गयी।

जहांगीर महल के सामने पत्थर से बना एक बड़ा कटोरा आकार का जलपात्र भी है, जिसमें संभवत: नहाने के लिये गुलाब जल रखा जाता था। महल में ईरानी शैलियों के वास्तुकला का प्रयोग जहांगीर ने करवाया था। इस शैली ने महल की बाहरी सुन्दरता को और भी निखार दिया था। आगरा किले में स्थित जहांगीर महल का निर्माण अकबर ने कराया था।

आगरा किले में यह सबसे बड़ा आवासीय भवन है। इस भवन में हिन्दू और एशियाई वास्तुकला का बेहतरीन मिश्रण देखने को मिलता है। अकबर ने जहांगीर महल के पास अपनी मनपसंद रानी जोधा बाई के लिए एक महल का निर्माण भी कराया था।
दीवान-ए-आम

जब आप किले की उत्तर की तरफ आप रूख करते हैं, तो आप दीवान-ए-आम से रूबरू होते हैं। इसे दी हॉल ऑफ पब्लिक ओडियन्स यानि आम जनता के दरबार के नाम से जाना जाता था। यह स्थान मछ्छी भवन के सामने स्थित है। दीवान-ए-आम पहुंचने के लिये आपको नीचे लगे सीढियों का सहारा लेना होगा। यह मुगल बादशाह का प्रमुख सभागार था। यहां पर मयूर सिंहासन या तख्ते ताउस स्थापित था। दीवान-ए-आम का प्रयोग आम जनता से बात करने और उनकी फरियाद सुनने के लिये होता था।

यहां पर मुगल बादशाह अपने अधिकारियों से भी मिलते थे। प्रारंभ में इसके ढ़ांचे का निर्माण मूल रूप से लकड़ी से किया गया था। बाद में मुगल शासक शाहजहां ने उसे वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। यहां पर शाहजहां शैली के प्रभाव को स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यहां पर लगे संगमरमर पर की गई फूलों की नक्काशी ने इसकी सुन्दरता को काफी आकर्षक बना दिया है। यहां से एक रास्ता नगीना मस्जिद और महिला बाजार की ओर जाता है, जहां केवल महिलाएं ही मुगल औरतों को सामान बेच सकती थीं।

इस सभागार की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि प्रवेश करने वाले को कोई नहीं देख सकता था लेकिन तख्ते ताउस पर बैठा शंहशाह प्रवेश करने वाले शख्स को आसानी से देख सकते थे। यहां पर उपस्थित सभा जन के हर एक गतिविधि को राजा तख्ते ताउस से आसानी से देख सकता था। लेकिन यहां प्रवेश करने वाले को यहां उपस्थित जन नहीं देख पाते थे क्योंकि पीछे मुडऩे पर कोई न कोई पीलर सामने आ जाता था। लेकिन उपस्थित सभा जन जो सभागार के दांये या बांये ओर होते थे, उनको सिंहासन पर बैठा शंहशाह दिखाई देती थी।

यहां की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस सभागार में जहां मयूर सिंहासन था, उसके ठीक दीवार में जालीनुमा खिड़की लगी हुयी थी, जो दूर से या नज़दीक से दिखाई भी नहीं देता था लेकिन इस जालीनुमा स्थान के पास राजघराने की महिलाएं दरबार की हरेक गतिविधियों को देख सकती थी। जब शाहजहां अपनी राजधानी आगरे से हटाकर दिल्ली कर दिया तो इस तख्ते ताउस को दिल्ली के लाल किले में ले आया। जिसे कालान्तर में ईरानी शासक और लुटेरा नादिरशाह लुटकर ले गया।
शीश महल

किले का एक महत्वपूर्ण बिल्डिंग शीश महल है, जो मुस्समन बुर्ज के विपरित दिशा में है। यह महल दीवान-ए-खास के नीचे है। यह स्थान देश के उन चुनिंदा स्थानों में आता है, जहां पर शीशे के द्वारा बेहतर सजावट की गयी है। यह राजघराने की महिलाओं का ड्रेसिंग रूम था। महल की दीवारों पर छोटे-छोटे शीशे के आइने गढ़े हुये थे । इस महल को ग्लास मौजेक करके सजाया गया था। यह अलंकारिक रूप से शीशे से सजाया गये महलों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर था। यह महल वस्तुत दो बड़े हॉल्स के मिलने से बना है।

इन दोनों बड़े हॉल्स की लंबाई 11.15 मीटर और चौड़ाई 6.40 मीटर है। ये दोनों ग्लास हॉल्स बड़े मेहराब के सहारे महल के केन्द्र से जुड़े हुये हैं । यह महल दोनों तरफ से एक संर्कीण गलियारे की ओर खुलता है। शीश महल के हमाम के अंदर सजावटी पानी की अभियांत्रिकी का उत्कृट उदाहरण है।
दीवान-ए-खास

यह सभागार शीश महल की दांयी ओर स्थित है। शंहशाह इस सभागार में राज कार्य और अन्य कामों के लिये वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक करते थे। यह इनका व्यक्तिगत सभागार था। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह महल संगमरमर रंगसाजी का उत्कृष्ट नमूना है। सभागार की आंतरिक और गृहमुख पर बेहतर नक्काशी की गयी है। यहां पर संगमरमर की पीलरर्स को बेहतर अलंकारिक रूप में सजाया गया है।

शाहजहां द्वार निर्मित पूरी तरह से संगमरमर का बना हुआ खास महल विशिष्ट हिन्दू -इस्लामिक शैली में है। दीवान-ए-खास को बादशाह का सोने का कमरा या आरामगाह भी माना जाता था। खास महल में सफेद संगमरमर की सतह पर चित्र कला का सबसे सफल उदाहरण दिया गया है।
मुसम्मन बुर्ज

यह खास महल की बांयी ओर स्थित है। इसका निर्माण शाहजहां ने कराया था। यह सुंदर अष्टभुजी स्तंभ से अलंकारिक है। बुर्ज का खुलापन ऊंचाइयां और शाम की ठण्डी हवाएं इसकी कहानी कहती है। यही वह स्थान है जहां शाहजहां ने ताज को निहारते हुए अंतिम सांसें ली थी
ले-आउट डिज़ाइन

इस किले की रूपरेखा काफी प्रभावित करने वाली है। यहां भारतीय संस्कृति के कई रूप और रंग देखने को मिलते हैं। हिन्दू, इस्लामी सभ्यता और कला के संयोग से बना यह किला बरबस ही किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। यह गंगा-यमुना संस्कृति का अनुपम सौगात है। इस किले में शहर की ओर का दिल्ली द्वार भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है, जिसे हाथी पोल कहते हैं, जिसके दोनों ओर दो पाषाण हाथी की मूर्तियां हैं। इन पाषाण मूर्तियों पर रक्षक भी खड़े हैं।

द्वार से खुलने वाला एक पुल है, जो खाई पर बना है। इसमें लगा दरवाजा इसे अजेय बनाता है। इस किले का दिल्ली गेट और लाहौरी गेट प्रसिद्ध है। लाहौरी गेट को अमर सिंह गेट भी कहा जाता है। स्मारक स्वरूप दिल्ली गेट, सम्राट का औपचारिक द्वार था, जिसे भारतीय सेना द्वारा वर्तमान में पैराशूट ब्रिगेड हेतु प्रयोग किया जाता है। किले के उत्तरी भाग को छाबनी रूप में प्रयोग किया जा रहा है। इसी कारण यह जन साधारण हेतु नहीं खुला है। यहां आने वाले पयर्टक लाहौर गेट से एंट्री ले सकते हैं।

इस गेट के बारे में कहा जाता है कि इस गेट का 'मुख' पाकिस्तान स्थित लाहौर की तरफ होने के कारण इसे यह नाम दिया गया था। स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से यह स्थल अति महत्वपूर्ण है। प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फज़ल लिखते हैं कि यहां लगभग पांच सौ सुंदर इमारतें बंगाली व गुजराती शैली में बनी हैं। कई इमारतों को श्वेत संगमरमर से बनाने के लिये पहले की कई इमारतों को खत्म भी किया गया। अधिकांश निर्माण को अंग्रेजों ने 1803 से 1862 के बीच बैरेक बनवाने हेतु तुड़वा दिया।

वर्तमान में दक्षिण-पूर्व की ओर मुश्किल से तीस इमारतें शेष हैं, इनमें से दिल्ली गेट, अकबर गेट व बंगाली महल है। जहांगीर ने अकबर दरवाजे का नाम बदलकर अमरसिंह द्वार कर दिया था। यह द्वार दिल्ली-द्वार से मेल खाता हुआ है। दोनों ही लाल बलुआ पत्थर के बने हैं। यहा स्थित बंगाली महल भी लाल बलुआ पत्थर का बना है। अब यह दो भागों (अकबरी महल व जहांगीरी महल) में बंटा हुआ है। यहां हिन्दू और मुस्लिम स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने देखने को मिलते हैं। निर्माण की स्थापत्यकला में इन दोनों संस्कृतियों के मेल किले की खूबसूरती को और भी बढ़ा देते हैं।

किले में अजदहे, हाथी व पक्षी, इस्लामी अलंकरणों में ज्यामितीय नमूने, इबारतें, आयतें आदि फलकों की सजावट में दिखाई देती हैं। इसके ऐतिहासिक महत्व का देखते हुये इसे वर्ष 1987 में यूनेस्को ने विश्व विरासत की सूची में शामिल कर लिया।

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और विजेता है

pryas जी को बहुत बहुत बधाई


पहेली मे भाग लेकर हमारा उत्साहवर्धन करने वाले


दर्शन लाल बवेजा


गजेन्द्र सिंह


बंटी "द मास्टर स्ट्रोक"


ओशो रजनीश


Basant सागेर


सचिन


निरंजन मिश्र (अनाम)


विजय कर्ण


Sawai Singh राजपुरोहित


किलर झपाटा


बेनामी


एक नयी पहेली के साथ शनिवार सुबह दस बजे आपसे फ़िर मिलेंगे तब

तक के लिये नमस्कार.

शनिवार, 14 मई 2011

पहेली - 4

आप सभी का स्वागत है एक नयी पहेली में,

नीचे दिखाये गये चित्र को ध्यान से देखिये और बताईये कि यह कौन सी जगह का चित्र हैं ?


जवाब देने का अन्तिम समय सोमवार शाम 07.00 बजे तक होगा।

कृपया पहेली मे पूछे गये चित्र के स्थान का सही सही नाम बतायें कि चित्र मे दिखाई गई जगह का नाम क्या है? उस राज्य का या शहर का नाम को अधूरा जवाब माना जायेगा। अपने जवाब के समर्थन में आप कोई लिंक देना चाहते है तो आप दे सकते है पर उसे आपका जवाब नहीं माना जाएगा । जगह का नाम लिखने को ही जवाब माना जाएगा ।

जरुरी सूचना:-

टिप्पणी मॉडरेशन लागू है इसलिए समय सीमा से पूर्व रोचकता बनाये रखने के लिये ग़लत या सही दोनों ही तरह के जवाब प्रकाशित किए जा सकते हैं अत: आपका जवाब आपको तुरंत यहां नही दिखे तो कृपया परेशान ना हों.

पहेली के लिए नियम इस प्रकार होंगे _


1- यह पहेली केवल मनोरंजन और थोडे बहुत ज्ञानवर्धन के लिये है। पहेली में आपके सामने एक चित्र होगा जो भारत में कहीं का भी हो सकता है।


2- आपको बताना होगा उस चित्र में दिख रहे स्थान का क्या नाम है और वो कहाँ पर स्तिथ है अर्थात उस राज्य का क्या नाम है। जरूरत होने पर हिंट भी प्रकाशित किया जाएगा।


3- पहेली का प्रकाशन हर शनिवार प्रातः 10.00 बजे किया जाएगा। जवाब देने का अन्तिम समय सोमवार शाम 07.00 बजे तक होगा।


4- पहेली के परिणाम की घोषणा मंगलवार शाम 7.00 बजे की जाएगी।


5- समयसीमा के बाद प्राप्त होने वाले जवाबो को प्रकाशित तो किया जाएगा पर परिणामो मे शामिल नहीं किया जाएगा।


6- आपका जवाब आपको यहां न दिखे तो कृपया परेशान ना हों। है, समयसीमा से पूर्व सही और गलत दोनों तरह के जवाब प्रकाशित किए जा सकते है


7- टिप्पणी मॉडरेशन लागू है. समय सीमा से पूर्व रोचकता बनाये रखने के लिये ग़लत या सही दोनों ही तरह के जवाब प्रकाशित किए जा सकते हैं.


8- यदि आप दिखाये गए चित्र के विषय मे कोई जानकारी रखते है तो अन्य पाठको से साझा करे


9- किसी भी तरह की विवादास्पद परिस्थितियों मे आयोजक का फ़ैसला ही अंतिम फ़ैसला होगा


10-
यदि आप किसी तरह का कोई सुझाव देना चाहते है तो आपका स्वागत है ।

मंगलवार, 10 मई 2011

पहेली - 3 (परिणाम) (जहाज महल, मांडू, धार, मध्यप्रदेश)

ब्लॉग जगत के प्रिय मित्रो आप सबको प्रणाम !

हम आपकी सेवा में हाजिर हैं पहेली - 3 का जवाब लेकर।

पहेली का सही उत्तर है

जहाज महल, मांडू, धार, मध्यप्रदेश
माण्डू

मांडू मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक पर्यटन स्थल है। यह इन्दौर से लगभग ९० किमी दूर है।


माण्डू विन्ध्य की पहाडियों में 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।


यह मूलत: मालवा के परमार राजाओं की राजधानी रहा था।


तेरहवीं शती में मालवा के सुलतानों ने इसका नाम शादियाबाद यानि "खुशियों का शहर" रख दिया था।


वास्तव में यह नाम इस जगह को सार्थक करता है। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में जहाज महल,


हिन्डोला महल, शाही हमाम और आकर्षक नक्काशीदार गुम्बद वास्तुकला के उत्कृष्टतम रूप हैं।



परमार शासकों द्वारा बनाए गए इस नगर में जहाज और हिंडोला महल खास हैं। यहाँ के महलों की स्थापत्य कला


देखने लायक है। मांडू इंदौर से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से यह धार


से भी जुड़ा हुआ है।


दरवाजे

मांडू में दाखिल होने के लिए 12 दरवाजे हैं। मुख्य रास्ता दिल्ली दरवाजा कहलाता है।


दूसरे दरवाजे रामगोपाल दरवाजा, जहांगीर दरवाजा और तारापुर दरवाजा कहलाते हैं।


जहाज महल

जहाजनुमा आकार में इस महल को दो मानवनिर्मित तालाबों के बीच बनाया गया था।


हिंडोला महल

टेड़ी दीवारों के कारण इस महल को हिंडोला महल कहा जाता है।


होशंग शाह की मस्जिद, जामी मस्जिद, नहर झरोखा, बाज बहादुर महल, रानी रूपमति महल और


नीलकंठ महल भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।


हर वर्ष मान्डु मे सरकार द्वारा मालवा उत्सव मनाया जाता है।


और विजेता है

बड़े ही अफसोस के साथ बताना पद रहा है कि इस बार

की पहेली का सही जवाब कोई नहीं दे पाया

पहेली मे भाग लेकर हमारा उत्साहवर्धन करने वाले

दर्शन लाल बवेजा

गजेन्द्र सिंह

आचार्य सुशील अवस्थी "प्रभाकर"

Basant Sager

Sachin

Harvansh Sharma

निरंजन मिश्र (अनाम)

बिग बॉस

ओशो रजनीश

DR. ANWER JAMAL


एक नयी पहेली के साथ शनिवार सुबह दस बजे आपसे फ़िर मिलेंगे तब

तक के लिये नमस्कार.

शनिवार, 7 मई 2011

पहेली - 3


आप सभी का स्वागत है एक नयी पहेली में,

नीचे दिखाये गये चित्र को ध्यान से देखिये और बताईये कि यह कौन सी जगह का चित्र हैं ?




जवाब देने का अन्तिम समय सोमवार शाम 07.00 बजे तक होगा।

कृपया पहेली मे पूछे गये चित्र के स्थान का सही सही नाम बतायें कि चित्र मे दिखाई गई जगह का नाम क्या है? उस राज्य का या शहर का नाम को अधूरा जवाब माना जायेगा। अपने जवाब के समर्थन में आप कोई लिंक देना चाहते है तो आप दे सकते है पर उसे आपका जवाब नहीं माना जाएगा । जगह का नाम लिखने को ही जवाब माना जाएगा ।

जरुरी सूचना:-

टिप्पणी मॉडरेशन लागू है इसलिए समय सीमा से पूर्व रोचकता बनाये रखने के लिये ग़लत या सही दोनों ही तरह के जवाब प्रकाशित किए जा सकते हैं अत: आपका जवाब आपको तुरंत यहां नही दिखे तो कृपया परेशान ना हों.

पहेली के लिए नियम इस प्रकार होंगे _


1- यह पहेली केवल मनोरंजन और थोडे बहुत ज्ञानवर्धन के लिये है। पहेली में आपके सामने एक चित्र होगा जो भारत में कहीं का भी हो सकता है।


2- आपको बताना होगा उस चित्र में दिख रहे स्थान का क्या नाम है और वो कहाँ पर स्तिथ है अर्थात उस राज्य का क्या नाम है। जरूरत होने पर हिंट भी प्रकाशित किया जाएगा।


3- पहेली का प्रकाशन हर शनिवार प्रातः 10.00 बजे किया जाएगा। जवाब देने का अन्तिम समय सोमवार शाम 07.00 बजे तक होगा।


4- पहेली के परिणाम की घोषणा मंगलवार शाम 7.00 बजे की जाएगी।


5- समयसीमा के बाद प्राप्त होने वाले जवाबो को प्रकाशित तो किया जाएगा पर परिणामो मे शामिल नहीं किया जाएगा।


6- आपका जवाब आपको यहां न दिखे तो कृपया परेशान ना हों। है, समयसीमा से पूर्व सही और गलत दोनों तरह के जवाब प्रकाशित किए जा सकते है


7- टिप्पणी मॉडरेशन लागू है. समय सीमा से पूर्व रोचकता बनाये रखने के लिये ग़लत या सही दोनों ही तरह के जवाब प्रकाशित किए जा सकते हैं.


8- यदि आप दिखाये गए चित्र के विषय मे कोई जानकारी रखते है तो अन्य पाठको से साझा करे


9- किसी भी तरह की विवादास्पद परिस्थितियों मे आयोजक का फ़ैसला ही अंतिम फ़ैसला होगा


10-
यदि आप किसी तरह का कोई सुझाव देना चाहते है तो आपका स्वागत है ।

बुधवार, 4 मई 2011

पहेली - 2 (परिणाम) (कोणार्क सूर्य मंदिर, पुरी, उड़ीसा)

ब्लॉग जगत के प्रिय मित्रो आप सबको प्रणाम !

हम आपकी सेवा में हाजिर हैं पहेली - 2 का जवाब लेकर।

पहेली का सही उत्तर है

कोणार्क सूर्य मंदिर, पुरी, उड़ीसा

कोणार्क का सूर्य मंदिर (जिसे अंग्रेज़ी में ब्लैक पगोडा भी कहा गया है), भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी जिले के पुरी नामक शहर में स्थित है। इसे लाल बलुआ पत्थर एवं काले ग्रेनाइट पत्थर से १२३६– १२६४ ई.पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। मंदिर, भारत की सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। इसे युनेस्को द्वारा सन १९८४ में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर सूर्य देव(अर्क) के रथ के रूप में निर्मित है। इस को पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया है। मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। आज इसका काफी भाग ध्वस्त हो चुका है। इसका कारण वास्तु दोष एवं मुस्लिम आक्रमण रहे हैं। यहां सूर्य को बिरंचि-नारायण कहते थे।

सूर्य मंदिर का स्थापत्य

यह मंदिर सूर्य देव(अर्क) के रथ के रूप में निर्मित है। इस को पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया गया है। मंदिर की संरचना, जो सूर्य के सात घोड़ों द्वारा दिव्य रथ को खींचने पर आधारित है, परिलक्षित होती है। अब इनमें से एक ही घोड़ा बचा है। इस रथ के पहिए, जो कोणार्क की पहचान बन गए हैं, बहुत से चित्रों में दिखाई देते हैं। मंदिर के आधार को सुंदरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महिनों को प्रतिबिंबित करते हैं जबकि प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है जो कि दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं।


मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं।

मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। तीसरे मंडप में जहां मूर्ती थी अंग्रेज़ों ने भारतीय स्वतंत्रता से पूर्व ही रेत व पत्थर भरवा कर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बंद करवा दिया था, ताकि वह मंदिर और क्षतिग्रस्त ना हो पाए। इस मंदिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं:

  • बाल्यावस्था-उदित सूर्य- ८ फीट
  • युवावस्था-मध्याह्न सूर्य- ९.५ फीट
  • प्रौढावस्था-अस्त सूर्य-३.५ फीट

इसके प्रवेश पर दो सिंह हाथियों पर आक्रामक होते हुए रक्षा में तत्पर दिखाये गए हैं। यह सम्भवतः तत्कालीन ब्राह्मण रूपी सिंहों का बौद्ध रूपी हाथियों पर वर्चस्व का प्रतीक है। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये २८ टन की ८.४फीट लंबी ४.९ फीट चौड़ी तथा ९.२ फीट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार कर लिया है।


उड़ीसा सरकार का राजचिह्न

ये १० फीट लंबे व ७ फीट चौड़े हैं। मंदिर सूर्य देव की भव्य यात्रा को दिखाता है। इसके के प्रवेश द्वार पर ही नट मंदिर है। ये वह स्थान है, जहां मंदिर की नर्तकियां, सूर्यदेव को अर्पण करने के लिये नृत्य किया करतीं थीं। पूरे मंदिर में जहां तहां फूल-बेल और ज्यामितीय नमूनों की नक्काशी की गई है। इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि की अकृतियां भी एन्द्रिक मुद्राओं में दर्शित हैं। इनकी मुद्राएं कामुक हैं, और कामसूत्र से लीं गईं हैं। मंदिर अब अंशिक रूप से खंडहर में परिवर्तित हो चुका है। यहां की शिल्प कलाकृतियों का एक संग्रह, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सूर्य मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित है। महान कवि श्री रविंद्र नाथ टैगोर इस मंदिर के बारे में लिखते हैं:

कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।

रविंद्र नाथ टैगोर

तेरहवीं सदी का मुख्य सूर्य मंदिर, एक महान रथ रूप में बना है, जिसके बारह जोड़ी सुसज्जित पहिये हैं, एवं सात घोड़ों द्वारा खींचा जाता है। यह मंदिर भारत के उत्कृष्ट स्मारक स्थलों में से एक है। यहां के स्थापत्य अनुपात दोषों से रहित एवं आयाम आश्चर्यचकित करने वाले हैं। यहां की स्थापत्यकला वैभव एवं मानवीय निष्ठा का सौहार्दपूर्ण संगम है। मंदिर की प्रत्येक इंच, अद्वितीय सुंदरता और शोभा की शिल्पाकृतियों से परिपूर्ण है। इसके विषय भी मोहक हैं, जो सहस्रों शिल्प आकृतियां भगवानों, देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्रों से भरी हैं। इनके बीच बीच में पशु-पक्षियों (लगभग दो हज़ार हाथी, केवल मुख्य मंदिर के आधार की पट्टी पर भ्रमण करते हुए) और पौराणिक जीवों, के अलावा महीन और पेचीदा बेल बूटे तथा ज्यामितीय नमूने अलंकृत हैं। उड़िया शिल्पकला की हीरे जैसी उत्कृष्त गुणवत्ता पूरे परिसर में अलग दिखाई देती है।


कामुक मुद्राओं की शिल्प आकृति

यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। इस प्रकार की आकृतियां मुख्यतः द्वारमण्डप के द्वितीय स्तर पर मिलती हैं। इस आकृतियों का विषय स्पष्ट किंतु अत्यंत कोमलता एवं लय में संजो कर दिखाया गया है। जीवन का यही दृष्टिकोण, कोणार्क के अन्य सभी शिल्प निर्माणों में भी दिखाई देता है। हजारों मानव, पशु एवं दिव्य लोग इस जीवन रूपी मेले में कार्यरत हुए दिखाई देते हैं, जिसमें आकर्षक रूप से एक यथार्थवाद का संगम किया हुआ है। यह उड़ीसा की सर्वोत्तम कृति है। इसकी उत्कृष्ट शिल्प-कला, नक्काशी, एवं पशुओं तथा मानव आकृतियों का सटीक प्रदर्शन, इसे अन्य मंदिरों से कहीं बेहतर सिद्ध करता है।

सूर्य मंदिर भारतीय मंदिरों की कलिंग शैली का है, जिसमें कोणीय अट्टालिका (मीनार रूपी) के ऊपर मण्डप की तरह छतरी ढकी होती है। आकृति में, यह मंदिर उड़ीसा के अन्य शिखर मंदिरों से खास भिन्न नहीं लगता है। २२९ फीट ऊंचा मुख्य गर्भगृह १२८ फीट ऊंची नाट्यशाला के साथ ही बना है। इसमें बाहर को निकली हुई अनेक आकृतियां हैं। मुख्य गर्भ में प्रधान देवता का वास था, किंतु वह अब ध्वस्त हो चुका है। नाट्यशाला अभी पूरी बची है। नट मंदिर एवं भोग मण्डप के कुछ ही भाग ध्वस्त हुए हैं। मंदिर का मुख्य प्रांगण ८५७ फीट X ५४० फीट का है। यह मंदिर पूर्व –पश्चिम दिशा में बना है। मंदिर प्राकृतिक हरियाली से घिरा हुआ है। इसमें कैज़ुएरिना एवं अन्य वृक्ष लगे हैं, जो कि रेतीली भूमि पर उग जाते हैं। यहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा बनवाया उद्यान है।

इतिहास


कोणार्क में पाषाण कला

यह कई इतिहासकारों का मत है, कि कोणार्क मंदिर के निर्माणकर्ता, राजा लांगूल नृसिंहदेव की अकाल मृत्यु के कारण, मंदिर का निर्माण कार्य खटाई में पड़ गया। इसके परिणामस्वरूप, अधूरा ढांचा ध्वस्त हो गया।[५] लेकिन इस मत को एतिहासिक आंकड़ों का समर्थन नहीं मिलता है। पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार, और कुछ १२७८ ई. के ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने १२८२ तक शासन किया। कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण १२५३ से १२६० ई. के बीच हुआ था। अतएव मंदिर के अपूर्ण निर्माण का इसके ध्वस्त होने का कारण होना तर्कसंगत नहीं है।

ध्वस्त होने के कारण

वास्तु दोष

यह मंदिर अपने वास्तु दोषों के कारण मात्र ८०० वर्षों में ही ध्वस्त हो गया। यह इमारत वास्तु-नियमों के विरुद्ध बनी थी। इस कारण ही यह समय से पहले ही ऋगवेदकाल एवं पाषाण कला का अनुपम उदाहरण होते हुए भी समय से पूर्व धराशायी हो गया। इस मंदिर के मुख्य वास्तु दोष हैं:- ।

  • मंदिर का निर्माण रथ आकृति होने से पूर्व, दिशा, एवं आग्नेय एवं ईशान कोण खंडित हो गए।
  • पूर्व से देखने पर पता लगता है, कि ईशान एवं आग्नेय कोणों को काटकर यह वायव्य एवं नैऋर्त्य कोणों की ओर बढ़ गया है।
  • प्रधान मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने नृत्यशाला है, जिससे पूर्वी द्वार अवरोधित होने के कारण अनुपयोगी सिद्ध होता है।
  • नैऋर्त्य कोण में छायादेवी के मंदिर की नींव प्रधानालय से अपेक्षाकृत नीची है। उससे नैऋर्त्य भाग में मायादेवी का मंदिर और नीचा है।
  • आग्नेय क्षेत्र में विशाल कुआं स्थित है।
  • दक्षिण एवं पूर्व दिशाओं में विशाल द्वार हैं, जिस कारण मंदिर का वैभव एवं ख्याति क्षीण हो गई हैं।
चुम्बकपत्थर

कई कथाओं के अनुसार, सूर्य मंदिर के शिखर पर एक चुम्बक पत्थर लगा है। इसके प्रभाव से, कोणार्क के समुद्र से गुजरने वाले सागरपोत, इस ओर खिंचे चले आते है, जिससे उन्हें भारी क्षति हो जाती है। अन्य कथा अनुसार, इस पत्थर के कारण पोतों के चुम्बकीय दिशा निरुपण यंत्र सही दिशा नहीं बताते। इस कारण अपने पोतों को बचाने हेतु, मुस्लिम नाविक इस पत्थर को निकाल ले गये। यह पत्थर एक केन्द्रीय शिला का कार्य कर रहा था, जिससे मंदिर की दीवारों के सभी पत्थर संतुलन में थे। इसके हटने के कारण, मंदिर की दीवारों का संतुलन खो गया, और परिणामतः वे गिर पड़ीं। परन्तु इस घटना का कोई एतिहासिक विवरण नहीं मिलता, ना ही ऐसे किसी चुम्बकीय केन्द्रीय पत्थर के अस्तित्व का कोई ब्यौरा उपलब्ध है।

कालापहाड़

सूर्य देव की एक शिल्पाकृति- कोणार्क में सूर्यदेव

कोणार्क मंदिर के गिरने से संबंधी एक अति महत्वपूर्ण सिद्धांत, कालापहाड से जुड़ा है। उड़ीसा के इतिहास के अनुसार कालापहाड़ ने सन १५०८ में यहां आक्रमण किया, और कोणार्क मंदिर समेत उड़ीसा के कई हिन्दू मंदिर ध्वस्त कर दिये। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मदन पंजी बताते हैं, कि कैसे कालापहाड़ ने उड़ीसा पर हमला किया। कोणार्क मंदिर सहित उसने अधिकांश हिन्दू मंदिरों की प्रतिमाएं भी ध्वस्त करीं। हालांकि कोणार्क मंदिर की २०-२५ फीट मोटी दीवारों को तोड़ना असम्भव था, उसने किसी प्रकार से दधिनौति (मेहराब की शिला) को हिलाने का प्रयोजन कर लिया, जो कि इस मंदिर के गिरने का कारण बना। दधिनौति के हटने के कारण ही मंदिर धीरे-धीरे गिरने लगा, और मंदिर की छत से भारी पत्थर गिरने से, मूकशाला की छत भी ध्वस्त हो गयी। उसने यहां की अधिकांश मूर्तियां और कोणार्क के अन्य कई मंदिर भी ध्वस्त कर दिये।

अर्चना बंद

इसके बाद १५६८ में उड़ीसा मुस्लिम नियंत्रण में आ गया। तब भी हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के निरंतर प्रयास होते रहे। इस समय पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पंडों ने भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति को श्रीमंदिर से हटाकर किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया। इसी प्रकार, कोणार्क के सूर्य मंदिर के पंडों ने प्रधान देवता की मूर्ति को हटा कर, वर्षों तक रेत में दबा कर छिपाये रखा। बाद में , यह मूर्ति पुरी भेज दी गयी, और वहां जगन्नाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित, इंद्र के मंदिर में रख दी गयी। अन्य लोगों के अनुसार, यहां की पूजा मूर्तियां अभी भी खोजी जानी बाकी हैं। लेकिन कई लोगों का कहना है, कि सूर्य देव की मूर्ति, जो नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है, वही कोणार्क की प्रधान

पूज्य मूर्ति है।

फिर भी कोणार्क में, सूर्य वंदना मंदिर से मूर्ति के हटने के बाद से बंद हो गयी। इस कारण कोणार्क में तीर्थयात्रियों का आना जाना बंद हो गया। कोणार्क का पत्तन (बंदरगाह) भी डाकुओं के हमले के कारण, बंद हो गया। कोणार्क सूर्य वंदना के समान ही वाणिज्यिक गतिविधियों हेतु भी एक कीर्तिवान नगर था, परन्तु इन गतिविधियों के बन्द हो जाने के कारण, यह एकदम निर्वासित हो चला, और वर्षों तक एक गहन जंगल से ढंक गया।

सन १६२६ में, खुर्दा के राजा, नृसिंह देव, सुपुत्र श्री पुरुषोत्तम देव, सूर्यदेव की मूर्ति को दो अन्य सूर्य और चन्द्

र की मूर्तियों सहित पुरी ले गये। अब वे पुरी के मंदिर के प्रांगण में मिलती हैं। पुरी के मदल पंजी के इतिहास से ज्ञात होता है, कि सन १०२८ में, राजा नॄसिंहदेव ने कोणार्क के सभी मंदिरों के नाप-जोख का आदेश दिया था। मापन के समय, सूर्य मंदिर अपनी अमलक शिला तक अस्तित्व में था, यानि कि लगभग २०० फीट ऊंचा। कालापहाड़ ने केवल उसका कलश, बल्कि पद्म-ध्वजा, कमल-किरीट और ऊपरी भाग भी ध्वंस किये थे। पहले बताये अनुसार, मुखशाला के सामने, एक बड़ा प्रस्तर खण्ड – नवग्रह पाट, होता था। खुर्दा के तत्कालीन राजा ने वह खण्ड हटवा दिया, साथ ही कोणार्क से कई शिल्प कृत पाषाण भी ले गया. और पुरी के मंदिर के निर्माण में उनका प्रयोग किया था। मराठा काल में, पुरी के मंदिर की चहारदीवारी के निर्माण में कोणार्क के पत्थर प्रयोग किये गये थे। यह भी बताया जाता है,

कि नट मंदिर के सभी भाग, सबसे लम्बे काल तक, अपनी मूल अवस्था में रहे हैं। और इन्हें मराठा काल में जान बूझ कर अनुपयोगी भाग समझ कर तोड़ा गया। सन १७७९ में एक मराठा साधू ने कोणार्क के अरुण स्तंभ को हटा कर पुरी के सिंहद्वार के सामने स्थापित करवा दिया। अठ्ठारहवीं शताब्दी के अन्त तक, कोणार्क ने अपना, सारा वैभव खो दिया, और एक जंगल में बदल गया। इसके साथ ही मंदिर का क्षेत्र भी जंगल बन गया, जहां जंगली जानवर और डाकुओं के अड्डे थे। यहां स्थानीय लोग भी दिन के प्रकाश तक में जाने से डरते थे।

कथाएं


कोणार्क मंदिर – रात में

एक कथा के अनुसार, गंग वंश के राजा नृसिंह देव प्रथम ने अपने वंश का वर्चस्व सिद्ध करने हेतु, राजसी घोषणा से मंदिर निर्माण का आदेश दिया। बारह सौ वास्तुकारों और कारीगरों की सेना ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और

ऊर्जा से परिपूर्ण कला से बारह वर्षों की अथक मेहनत से इसका निर्माण किया। राजा ने पहले ही अपने राज्य के बारह वर्षों की कर-प्राप्ति के बराबर धन व्यय कर दिया था। लेकिन निर्माण की पूर्णता कहीं दिखायी नहीं दे रही थी। तब राजा ने एक निश्चित तिथि तक कार्य पूर्ण करने का कड़ा आदेश दिया। बिसु महाराणा के पर्यवेक्षण में, इस वास्तुकारों की टीम ने पहले ही अपना पूरा कौशल लगा रखा था। तब बिसु महाराणा का बारह वर्षीय पुत्र, धर्म पाद आगे

आया। उसने तब तक के निर्माण का गहन निरीक्षण किया, हालांकि उसे मंदिर निर्माण का व्यवहारिक ज्ञान नहीं था, परन्तु उसने मंदिर स्थापत्य के शास्त्रों का पूर्ण अध्ययन किया हुआ था। उसने मंदिर के अंतिम केन्द्रीय शिला को लगाने की समस्या सुझाव का प्रस्ताव दिया। उसने यह करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। लेकिन इसके तुरन्त बाद ही इस विलक्षण प्रतिभावान का शव सागर तट पर मिला। कहते हैं, कि धर्मपाद ने अपनी जाति के हितार्थ अपनी जान तक दे दी।

पौराणिक महत्त्व

यह मंदिर सूर्यदेव (अर्क) को समर्पित था, जिन्हें स्थानीय लोग बिरंचि-नारायण कहते थे। यह जिस क्षेत्र में स्थित था, उसे अर्क-क्षेत्र या पद्म-क्षेत्र कहा जाता था। पुराणानुसार, श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को उनके श्राप से कोढ़ रोग हो गया था। साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की, और सूर्य देव को प्रसन्न किया। सूर्यदेव, जो सभी रोगों के नाशक थे, ने इसका रोग भी अन्त किया। उनके सम्मान में, साम्ब ने एक मंदिर निर्माण का निश्चय किया। अपने रोग-नाश के उपरांत, चंद्रभाग नदी में स्नान करते हुए, उसे सूर्यदेव की

एक मूर्ति मिली। यह मूर्ति सूर्यदेव के शरीर के ही भाग से, देवशिल्पी श्री विश्वकर्मा ने बनायी थी। साम्ब ने अपने बनवाये मित्रवन में एक मंदिर में, इस मूर्ति की स्थापना की। तब से यह स्थान पवित्र माना जाने लगा।

बिजली की समस्या के कारण परिणाम समय पर नहे दे पाया उसके लिए खेद है

और विजेता है


सुज्ञ जी को विजेता बनने पर बहुत बहुत बधाई

इनके बाद सही जवाब देने वाले

दर्शन लाल बवेजा

विजय कर्ण

M

pryas

पहेली मे भाग लेकर हमारा उत्साहवर्धन करने वाले

Sachin

ओशो रजनीश

निरंजन मिश्र (अनाम)

आचार्य सुशील अवस्थी "प्रभाकर"

M.R.Ghori

बेनामी

रामपुरी सम्राट श्री राम लाल

बिग बॉस

एक नयी पहेली के साथ शनिवार सुबह दस बजे आपसे फ़िर मिलेंगे तब तक के लिये नमस्कार.